Tuesday, October 5, 2021

#करो_न_करो_ना - कोविड वैक्सीनेशन : मोहतरमा कहकशाँ जबी

 

#करो_न_करो_ना - कोविड वैक्सीनेशन : मोहतरमा कहकशाँ जबी

https://youtu.be/XhkbIrhKjWQ

किताबों की दुनिया वाक़ई अनोखी होती है | सिर्फ़ जानकारी में ही इज़ाफ़ा नहीं करती बल्कि गाहे-बगाहे हमारा हाथ पकड़ कर बचपन के उन गलियारों की भी सैर करा लाती है, जहाँ तक और किसी ज़रिए रसाई नामुमकिन है | कोरोना को ही देख लो | जब सारी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ था कि न जाने यह कौन सा नया वायरस है जिसने मौत को रूबरू ला खड़ा कर दिया है, तब विद्यार्थी जीवन में पढ़ी किताबों ने याद दिलाया कि इस वायरस का नाम हमने तो बचपन में ही पढ़ लिया था | यह और बात है कि तब हमने इसे कोविड के नाम से नहीं, बल्कि मामूली नज़ला-ज़ुकाम-खाँसी के रूप में जाना था, इसीलिए तब इसे रत्ती बराबर भी अहमियत नहीं दी थी | 

वैक्सीन के सिलसिले में भी यही बात लागू होती है | जब से होश संभाला, तब से ये ही पता था कि Meningococcal, Tetanus, Diphtheria, Pertussis, BCG, Influenza, Chickenpox, Hepatitis, Measles, Mumps, Polio, Pneumococcal, Rotavirus, Rubella जैसे तमाम टीके बच्चे की पैदाइश से लेकर किशोरावस्था तक लगा दिए जाते हैं ताकि वो ता-ज़िंदगी इन बीमारियों से महफ़ूज़ रह सके | लेकिन कोविड की वैक्सीन पहले बच्चों नहीं, बड़ों के लिए आई | और पहले बड़ों के लिए आई यही कोविड वैक्सीन फिर से हमें स्कूल में पढ़ी उन किताबों के सफ़र पर ले गई, जहाँ हमने पढ़ा था कि डॉक्टर एडवर्ड जेनर की ईजाद, चेचक का टीका भी, पहले बड़ों को लगाया गया | 

या फिर लॉकडाउन की ही बात कर लें | हमने क्या, हमारी किसी भी पिछली पीढ़ी ने न लॉकडाउन की मार झेली थी और न ही कभी इस निर्मम, ज़ालिम, क्रूर लफ़्ज़ को सुना तक था | पर किताबों पर हमें पूरा भरोसा था | लगा, कि हो न हो, इसका भी ज़िक्र किसी न किसी नाम से हमने बचपन में ज़रूर पढ़ा होगा | और इस बार भी किताबों ने भरोसा टूटने नहीं दिया | स्कूल के दिनों में पढ़ी शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की कविता नज़र से गुज़री | 

हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिंजरबद्ध न गा पाएँगे|

कनक-तीलियों से टकराकर, पुलकित पंख टूट जाएँगे ||

नीड़ न दो चाहे टहनी का, आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो |

लेकिन पंख दिए हैं, तो आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ||

स्कूल में तो यह कविता महज़ पढ़ने के लिए पढ़ी थी | बड़े होने के बाद इसमें छिपी मासूम, बेज़ुबान पंछियों की उस पीड़ा का अहसास हुआ, जो वो पिंजरे में क़ैद होने पर झेलने को मजबूर होते हैं | लेकिन कोविड के कारण लगे 2 निर्मम लॉकडाउन ने इस कविता को देखने के लिए एक नया नज़रिया दे दिया | अचानक लगे लॉकडाउन से, घर से दूर फँस जाने वालों की व्यथा बिल्कुल वैसी ही लगी जैसी पिंजरे में क़ैद पंछी के दर्द की अक्कासी इस कविता में की गई है | 

चीन के वुहान से शुरू हुए, कोविड-19 का पहला मामला, भारत में 30 जनवरी 2020 को सामने आया था | हालांकि भारत से पहले कई देशों में यह वायरस फैल चुका था, जिसे देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी World Health Organisation ने 31 जनवरी को कोरोना वायरस को अंतरराष्ट्रीय आपदा घोषित किया था। इसके बाद जब दुनिया के अलग-अलग देशों में संक्रमण के मामले बढ़ने लगे तो WHO ने 11 मार्च को इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया। दुनिया के कई देशों की तरह हमारे देश में भी इससे बचने का एक ही रास्ता दिखाई दिया - लॉकडाउन | सरकार ने 22 मार्च को पहले 'जनता कर्फ़्यू' का एलान किया और फिर अगले ही दिन यानी 23 मार्च से 21 दिन का लॉकडाउन घोषित कर दिया, जो बार-बार बढ़ाया जाता रहा | मंशा यह थी कि कोविड संक्रमण को बढ़ने से रोका जा सके | पर जो भी इन लॉकडाउन्ज़ की ज़द में आए, यह सिर्फ़ वो ही जानते हैं कि लॉकडाउन से गुज़रना, कोविड संक्रमण से गुज़रने से कम दुःखदायी नहीं था |

कहकशाँ जबी और उनका परिवार भी उन्हीं बेक़ुसूर मगर लाचार लोगों में शामिल रहे, जो पिंजरे में क़ैद पंछी की तरह अपने घर पहुँचने को फड़फड़ा रहे थे, मगर पिंजरे के दरवाज़े पर लॉकडाउन नाम का ताला लगा था | एक वक़्त आया, जब ई-पास नाम की चाबी से यह ताला खुल भी गया, पर तब यातायात का कोई साधन नहीं था | हालत यह हो गई थी कि पिंजरा खुल जाने के बावजूद, पंख होते हुए भी और सामने खुला आसमान मयस्सर हो जाने पर भी, ये क़ैदी थे, बेबस थे, हर लम्हा उस समाधान को तलाशते थे, जो इन्हें इनकी मंज़िल तक पहुँचा दे |

बीबी कहकशाँ जबी, आपका बहुत शुक्रिया | आपने लॉकडाउन की अपनी आपबीती नक़्श के साथ साझा की | आपका कड़वा तजुर्बा समाज को यह पैग़ाम देता है कि अगर लॉकडाउन जैसी परेशानियों से बचना हो तो कोविड का टीका लगवाकर ख़ुद की और समाज की हिफ़ाज़त कर लें | ताकि पंख होने के बावजूद आकुल उड़ान में विघ्न न पड़ने पाए |

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Thursday, September 30, 2021

#करो_न_करो_ना - कोविड वैक्सीनेशन : सुश्री आरती यादव

 


#करो_न_करो_ना - कोविड वैक्सीनेशन : सुश्री आरती यादव, अपनी माँ की याद में....

https://youtube.com/shorts/RUVt-DQttPU?feature=share


चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन सा देस, जहाँ तुम चले गए |

इस दिल पे लगा के ठेस, जाने वो कौन सा देस, जहाँ तुम चले गए ||

 

आनन्द बक्षी की यह ग़ज़ल,1998 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दुश्मन' में हमने पहली बार सुनी थी | उस वक़्त आरती शायद इतनी छोटी रही होंगी कि उन्हें इस ग़ज़ल के मायने समझ नहीं आए होंगे | मगर बेरहम कोविड-19 ने उन्हें ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुख दिया, उनसे उनकी माँ छीन ली और पलक झपकते हमेशा खिलखिलाने-चहचहाने वाली आरती को इतना मैच्योर बना दिया कि आज यूँ लगता है मानो इस ग़ज़ल का हर शेर उनकी व्यथा बयान करता हो | 

नक़्श के अभियान #करो_न_करो_ना के दूसरे चरण के लिए टीकाकरण की अपील समाज से करके एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का कर्तव्य तो आरती ने निभा दिया, मगर ज़ालिम कोविड की बेदर्दी का शिकार, अपनी माँ से बिछड़ी बेटी कैमरा के सामने अपना दर्द न बयान कर सकी | जब आरती की मम्मी श्री मती किरण बाला अस्पताल में दाख़िल थीं, तब हर चंद कोशिशों के बावजूद आरती उनके आख़िरी वक़्त में उनके पास न रह सकीं | वॉर्ड के बाहर वो तड़पती रहीं कि किसी तरह माँ के पास पहुँच जाएँ और उनका ख़याल रख सकें, पर स्वास्थ्य कारणों से अस्पताल के स्टाफ़ ने इसकी इजाज़त नहीं दी | यह याद करके उनके आँसू नहीं थमते हैं कि अनगिनत बार वार्ड से उनकी मम्मी ने उन्हें फ़ोन करके बाक़ायदा उनसे मिन्नतें की थीं कि "आरती, मुझे यहाँ से ले जा, वर्ना मैं मर जाउँगी |" पर आरती उस वक़्त इतनी बेबस हो के रह गई थीं कि कुछ न कर सकीं |


एक आह भरी होगी, हमने ना सुनी होगी, जाते-जाते तुमने, आवाज़ तो दी होगी |

हर वक़्त यही है गम, उस वक़्त कहाँ थे हम, कहाँ तुम चले गए ||


टीस तो यह भी उठती है, तकलीफ़ तो यह भी सालती है आरती को कि सिर्फ़ जीते-जी ही नहीं, उनके जाने के बाद भी वो अपनी माँ का हक़ अदा न कर सकीं | उनकी अंतिम क्रियाएँ भी बेदर्द कोविड की वजह से ढंग से न निभा सकीं | ग़ाज़ियाबाद में रहने वाली आरती को न इसकी इजाज़त दी गई कि वो अपनी माँ का पार्थिव शरीर अपने घर ले जा कर वहाँ से विधि-विधान पूर्वक उनका अंतिम संस्कार कर सकें और न ही इतनी मोहलत उन्हें मयस्सर हो सकी कि उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए  कम से कम घरवालों को ही बुला लें | माँ के पार्थिव शरीर का आनन-फ़ानन में अंतिम संस्कार करना बेटी की वो मजबूरी बन गई, जिसने उसके दिल पर कभी न भरने वाला एक और ज़ख़्म बना दिया |


हर चीज़ पे अश्कों से, लिक्खा है तुम्हारा नाम, ये रस्ते घर गलियाँ, तुम्हें कर ना सके सलाम|

हाय दिल में रह गई बात, जल्दी से छुड़ा कर हाथ, कहाँ तुम चले गए||


माँ के जाने से आरती की मानो दुनिया ही लुट गई | हालांकि माँ की दी हुई सीख ने ही उन्हें यह हिम्मत दी कि बुरी तरह बिखर चुकी ज़िंदगी के एक-एक टुकड़े को समेट कर दोबारा उसी तरह जीने की पूरी कोशिश कर रही हैं आरती, लेकिन जो नासूर कोविड ने उन्हें दिया है, उस तकलीफ़ की शिद्दत उनके अलावा और किसी के लिए महसूस कर सकना शायद नामुमकिन है |


अब यादों के कांटे, इस दिल में चुभते हैं, ना दर्द ठहरता है, ना आंसू रुकते हैं |

तुम्हें ढूंढ रहा है प्यार, हम कैसे करें इक़रार, के हाँ तुम चले गए ||


सुश्री आरती यादव के दुख की भरपाई कोई शब्द, किसी की सांत्वना कभी नहीं कर सकते | बस हम जो कर सकते हैं, वो यह कि उनकी अपील पर अमल करते हुए, वैक्सीनेट हो कर, एक कोविड रहित स्वस्थ समाज का उपहार आने वाली नस्लों को दें, ताकि फिर कोई, अपने प्रियजनों की अंतिम विदाई पर इतना मजबूर न हो जैसे आरती हुईं |

आरती जी, अपने अथाह दर्द के बावजूद, हमारे अभियान में सहयोग के लिए, आपका बहुत धन्यवाद | हमारी दुआ है कि आप इस दुख को सह कर वैसी सशक्त आरती बन सकें, जैसी आरती को आपकी मम्मी हमेशा देखना चाहती थीं | श्री मती किरण बाला जी को नक़्श की ओर से श्रद्धांजलि |


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Saturday, September 25, 2021

#करो_न_करो_ना - कोविड वैक्सीनेशन : डॉक्टर शहनाज़ अख़तर





#करो_न_करो_ना - कोविड वैक्सीनेशन : डॉक्टर शहनाज़ अख़तर, रिसर्च साइंटिस्ट 

               https://youtu.be/pF_r_G02TAY



Prevention is better than cure. यानी बचाव इलाज से बेहतर है | यह बात जानते तो सब हैं लेकिन कोविड के संदर्भ में इस पर अमल करने से अब भी भारत का एक बड़ा वर्ग हिचकिचाहट में है | सरकारी आंकड़ों के अनुसार 16 जनवरी 2021 से शुरू हुए कोविड टीकाकरण कार्यक्रम ने 13 सितम्बर 2021 को 75 करोड वैक्सीनेशन डोज़ का लक्ष्य पूरा कर लिया | यानी अब तक देश की आधी से ज़्यादा आबादी वैक्सीनेट हो चुकी है | मगर अपने आस-पास नज़र दौड़ाएँ तो पढ़े-लिखे, जागरुक और टैक्नीकली साउंड लोगों के अलावा सिर्फ़ उन्हीं के टीका लगा हुआ पाएँगे, जिन्हें ऐसी कोई मजबूरी है कि रोज़गार तभी मिलेगा, जब टीका लगवा लेंगे | या डॉक्टर तभी इलाज करेगा, जब वैक्सीनेटिड होंगे | या दूसरे शहर तभी जा सकेंगे, जब टीका लगा होने का सर्टिफ़िकेट हाथ में होगा आदि | वर्ना जहाँ तक हो सके यह वर्ग टीका लगवाने से अब भी कतरा रहा है | 

ये मासूम लोग शायद यह मानना ही नहीं चाहते कि कोविड महामारी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार अब तक सिर्फ़ वैक्सीनेशन ही है | या कोविड अक्सर बहुत तकलीफ़देह यहाँ तक कि कई बार जानलेवा बीमारी भी साबित होती है | कोविड से होने वाली तकलीफ़ सिर्फ़ वो ही समझ सकता है, जो इसकी चपेट में आ चुका है | न केवल कोविड के दौरान बल्कि बाद में भी कोरोना वायरस के long term effects और post-COVID complications ने अनगिनत लोगों को अपना शिकार बनाया है | जिसमें Severe Acute Respiratory Syndrome आमतौर पर पाया गया | इसके कारण lungs, brain, blood vessels, skin, nerves, kidney और heart संबंधी समस्याओं से कई-कई माह मरीज़ों को जूझना पड़ा | न सिर्फ़ जिस्मानी बल्कि दिमाग़ी तनाव से भी गुज़रना पड़ा | यह सब महज़ कही-सुनी कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि हमारे इर्द-गिर्द ही, हमारे पड़ोसी, रिश्तेदार, साथी, दोस्त और कई बार हमारे परिवार वाले ही इस बेदर्द वायरस का शिकार हो चुके हैं |

डॉक्टर शहनाज़ अख़तर भी, जो देश की एक टॉप फ़ार्मास्युटिकल कंपनी में रिसर्च साइंटिस्ट हैं, उन्हीं में से एक हैं, जो अंजाने और अनचाहे ही न सिर्फ़ कोविड की ज़द में आ कर ज़िंदगी और मौत के बीच की बाल से भी बारीक डगर को तय करके दोबारा जिंदगी के हसीन सफ़र पर लौट आईं, बल्कि post covid complications का सामना करते हुए कई माह तक सेहत और बीमारी के दर्मियान होने वाले ख़ौफ़नाक खेल की भुक्तभोगी भी साबित हुईं | अपनी आपबीती को बेहद कम अल्फ़ाज़ में हम तक पहुँचा कर हर ख़ास-ओ-आम से वैक्सीनेट होने की अपील करती डॉ. शहनाज़ अख़तर का दर्द उनकी ज़बान ही नहीं, बल्कि चेहरे और आँखों में भी दिखता है | जो सिर्फ़ यही कहता महसूस होता है कि मेहरबानी करके सब टीका लगवा लें | ख़ुद भी सुरक्षित हो जाएँ और एक निरोग सुरक्षित समाज के निर्माण में भी अपना योगदान दें |
#करो_न_करो_ना का नक़्श का यह दूसरा चरण है, जिसे हमने आज ख़ासतौर पर 25 सितम्बर से शुरू किया है क्योंकि आज डॉ. शहनाज़ अख़तर की सालगिरह भी है | जिंदगी सबसे क़ीमती है, यह संदेश देने का इससे बेहतर कोई मौक़ा नहीं हो सकता था | 

हमारे अभियान में अपना योगदान देने के लिए डॉ. शहनाज़ अख़तर, आपका बेहद शुक्रिया | साथ ही आपके जन्मदिन पर आपको A Very Happy Birthday और आपके साथ-साथ हर covid survivor के लिए एक लंबी, सेहतमंद ज़िंदगी की शुभकामनाएँ |

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Friday, November 6, 2020

#करो_न_करो_ना (dos & donts) - Parikul Bhardwaj

 #करो_न_करो_ना (dos & donts) - Parikul Bhardwaj


 #करो_न_करो_ना (dos & donts) - Parikul Bhardwaj

घर से निकलने को दरवाज़ा खोला ही था कि सामने से तीन साल के भतीजे ने अपनी टॉय पिस्टल तानते हुए बड़े स्टाइल में कहा - "हैंडसम"| मैंने हैंडसअप को हैंडसम पहली बार बनते देखा था| इसलिए भतीजे की मासूमियत पर मुझे बेसाख़्ता प्यार आ गया| मैंने पूछा - क्या चाहिए आपको? वो बोला - कितने दिन हो गए | कोई मुझे बाहर नहीं ले जाता| मुझे "वलीना आइसक्रीम" खानी है| इस बार मेरी हँसी छूट गई| बेचारी आइसक्रीम का फ़्लेवर ही बदल डाला| मैंने हँसते हुए वादा किया - आपकी वनीला.. सॉरी वलीना आइसक्रीम आपको शाम को घर पर ही मिल जाएगी, उसके लिए बाहर जाने की क्या ज़रूरत? बाहर बच्चों को डराने के लिए गंदे वाले कोविड अंकल बैठे हैं न, इसलिए बच्चे आजकल बाहर नहीं जा रहे हैं| मासूम बच्चा मेरी बात मान गया और मैंने अपनी राह ली|

बाहर निकलते ही एक रिक्शावाला दिखा| मैंने पूछा - कॉलोनी चलोगे? बोला - नहीं जी| वहाँ कुछ दिन पहले "लिमंट्री" लगी थी, वहाँ नहीं जाएँगे| मैंने अचरज से पूछा - लिमंट्री मतलब? बोला - बोर्ड लगा था न, कोई अंदर नहीं जा सकता| मैंने कहा - ओह! नो एंट्री| बोला - हाँ, हाँ, वो ही| मैंने कहा - पर वो तो लॉकडाउन की बात है, तब कॉलोनी कंटेनमेंट ज़ोन में थी| अब सब ठीक है| वह बोला - न, न| हम तब भी नहीं जाएँगे| आपके लिए इतना कर सकते हैं कि कॉलोनी से पहले जो "फ़ावरीगेट" पड़ता है, आपको वहाँ छोड़ देंगे| मैंने दिल्लीगेट से लेकर अजमेरीगेट, कश्मीरीगेट, लाहौरीगेट, तुर्कमानगेट, मोरीगेट यहाँ तक कि इंडियागेट तक सारे गेटों के नाम सुन रखे थे| पर फ़ावरीगेट आज पहली बार सुना| पूछ ही लिया - यह फ़ावरीगेट कौन सा है भैया? बोला - वही, जहाँ आग बुझाने वाली टमटमें खड़ी होती हैं| मुझे समझते देर न लगी, वह फ़ायर-स्टेशन में खड़े फ़ायरब्रिगेड को फ़ावरीगेट कह रहा था| मैंने उसे ग़लती का अहसास कराने के बजाए कहा - ठीक है भैया| आप मुझे फ़ावरीगेट पर ही छोड़ देना| उसके चेहरे पर एक चमक सी आई | रिक्शा पर पैडल मारता हुआ बोला - बैठिए| वैसे हमें लगता है आपने "अनवरसिटी" से पढ़ाई नहीं की है| तभी आपको न लिमंट्री पता है, न ही फ़ावरीगेट| अब मेरा दिमाग़ चकराया| मैंने पूछा - कौन सी सिटी? बोला - अनवरसिटी| जहाँ कालिज के बाद की पढ़ाई होती है| मेरा दिमाग़ भन्ना गया| मैंने ज़रा खीझते हुए कहा - अनवरसिटी नहीं, यूनिवर्सिटी | लापरवाही से बोला - एक ही बात है| वैसे आपने कहाँ तक पढ़ाई की है? न चाहते हुए भी मैंने बता दिया - बी. ए. तक| वह बोला - तभी तो कुछ नहीं पता आपको| दो ही अक्षर पढ़े, वो भी उल्टे| इतना तो हम भी बता सकते हैं कि पहले ए आता है, फिर बी| मैंने अपना सिर पीटते हुए कहा - बी. ए. मायने, बैचलर ऑफ़ आर्ट्स | पर तुम क्या समझो? यह कॉमन सेंस की बात है| वो अकड़कर बोला - ऐसा न कहें आप| हमारे पास है "कॉमन साइंस"| बहुत "कॉमन साइंस" है हमारे पास| उसकी बात सुन ग़ुस्से के बजाय इस बार मुझे हँसी आ गई| मैंने हँसते हुए कहा - ठीक कहा तुमने दोस्त| तुम्हारी कॉमन साइंस वाक़ई क़ाबिल-ए-तारीफ़ है| आज तुमसे मैंने बहुत कुछ सीखा| चलो अब मुझे यहीं उतार दो| देखो, तुम्हारा फ़ावरीगेट आ गया है| इसके आगे तो तुम जाओगे नहीं, क्योंकि कुछ दिन पहले वहाँ लिमंट्री जो लगी थी| वह विजयी मुस्कान के साथ बोला - देखा मेरी संगत का असर! आपको भी चीज़ें समझ में आने लगी हैं अब| किराया उसके हवाले कर मैंने उसे तो चलता किया, पर मन में ये ख़्याल चल रहे थे कि वाक़ई यह समझदार है, जो अनलॉक के दौर में भी इतनी सावधानी बरत रहा है| वर्ना आमतौर पर तो अब लोग न मास्क लगाए दिख रहे हैं, न सैनिटाइज़ेशन और दो गज़ की दूरी का ध्यान रखते|

ऐसे ही लोगों के लिए राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार 2020 से सम्मानित, देश की बहादुर बच्ची परीकुल भारद्वाज ने त्यौहारों के इस मौसम में, नक़्श के माध्यम से समाज को एक पैग़ाम दिया है| ताकि त्यौहारों की ख़ुशियों में कहीं हम यह न भूल जाएँ कि गंदे वाले कोविड अंकल अब भी घात लगाए बैठे हैं| ज़रा सी लापरवाही फिर से हमें लिमंट्री ज़ोन में ला खड़ा कर सकती है|

Thank you so much "Parikul Bhardwaj ji" for being a part of our campaign #karo_na_karo_naa..


[परीकुल भारद्वाज समाज में नेतृत्व, प्रेरणा तथा ऊंचे हिमालय शिखरों पर दी जाने वाली निस्वार्थ सेवाओं का एक जीवंत उदाहरण है। मात्र 13 साल की उम्र में वीरता, शौर्य का अद्भुत ज़ज्बा रखते हुए, उच्च पर्वत शिखरों पर जोखिम उठाने वाली, परीकुल भारद्वाज राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद द्वारा “राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार 2020” से सम्मानित हैं| इतनी ऊँचाइयों पर अपनी समाज सेवी गतिविधियों द्वारा समाज हित के लिए योगदान देने वाली, लोगों की जान बचाने के लिए कार्य करने वाली  सबसे कम आयु की पहली लड़की हैं। परिकुल किसी भी  वर्ग, पंथ, धर्म या जाति की परवाह किए बिना जोखिम भरे उच्च शिखरों पर स्वास्थ्य सेवाएं दे रही हैं। इस बचाव कार्य हेतु उनका कठिन प्रशिक्षण सिक्स सिग्मा हाई अल्टिट्यूड सेवाओं, आई.टी.बी.पी., एन.डी.आर.एफ. और वायुसेना के संयुक्त तत्वावधान में हुआ है। "नेशनल ज्योग्राफिक चैनल" और "आकाशवाणी" द्वारा भी उनके साहसिक, निस्वार्थ व अथक प्रयासों पर प्रकाश डाला गया है ।

परीकुल भारद्वाज द्वारा प्राप्त पुरस्कार / सम्मान:-

-थलसेनाध्यक्ष द्वारा सराहना

-इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड 

-विश्व के सर्वश्रेष्ठ 100 रिकॉर्ड धारकों  में से एक 

- सिक्स सिग्मा द्वारा प्रदत्त हाई अल्टि ट्यूड अवॉर्ड|

(Instagram @parikulbhardwaj) ]


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Saturday, October 10, 2020

#करो_न_करो_ना (dos & donts) - Neetu Sharma

 #करो_न_करो_ना (dos & donts) - Neetu Sharma


#करो_न_करो_ना (dos & donts) - Neetu Sharma

कोई 12-13 रोज़ पहले, 27 सितम्बर के "The Times of India" के Delhi edition में छपी ख़बर पढ़कर बेसाख़्ता हँसी आ गई | भोपाल की एक लड़की अपने पिता के ख़िलाफ़ फ़ैमिली कोर्ट जा पहुँची क्योंकि उसके पिता ने उसे कई बार लूडो खेलते हुए हरा दिया था |

दरअसल नोवल कोरोना वायरस कोविड-19 के कारण देशभर में लगे लॉकडाउन के दौरान, समय बिताने के लिए लड़की, उसके भाई-बहन और उनके पिता लूडो खेल लिया करते थे, जिसमें पिता ने बार-बार अपनी लाडली बेटी को हरा दिया | बेटी को यह पिता द्वारा जानबूझ कर किया गया विश्वासघात लगा क्योंकि उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसके पिता उसे कभी हरा सकते हैं | शुरू में बेटी को दुख हुआ | फिर दुख, ग़ुस्से में बदला | ग़ुस्सा, अपमान के अहसास में, उसके बाद नाराज़गी, फिर आक्रोश और आख़िरकार इन सारी भावनाओं ने द्वेष का वह विकराल रूप धारण कर लिया कि बेटी ने अपने पिता को पिता कहकर पुकारना तक बंद कर दिया और अदालत का दरवाज़ा खटखटा दिया |

पहली नज़र में यह ख़बर चौंका सकती है | हँसी भी आ सकती है | मगर ज़रा सा गहराई में सोचते ही मामले की गंभीरता समझ में आ जाती है | और तब एक ही बात सही साबित होती है कि पूरे वाक़ये में कोविड के अलावा और किसी का दोष नहीं | न कोविड इस बुरी तरह फैलता, न लॉकडाउन की नौबत आती, न पूरा परिवार एक साथ लूडो खेलने बैठता, और न यह सूरत-ए-हाल बनती कि बाप-बेटी के रिश्ते में दरार पड़ती | 

अगले हफ़्ते शारदीय नवरात्रि पर्व आरम्भ हो रहा है, और उसी के साथ-साथ क़तार में एक के पीछे एक चले आ रहे हैं - दुर्गा पूजा, महानवमी, दशहरा, शरद पूर्णिमा, करवाचौथ, अहोई अष्टमी और दीवाली | पर त्योहारों की इन ख़ुशियों के पीछे कोविड-19 अपना फन फैलाए डरा भी रहा है | बंगाल की दुर्गा पूजा, गुजरात का गरबा-डांडिया, करवाचौथ की कथा और मेहंदी का जमावड़ा या दशहरे की रामलीला, सभी भीड़-भड़क्का वाले त्योहार हैं | लेकिन कहीं भी भीड़ जमा न हो, इस साल प्रशासन की तरफ़ से सख़्त हिदायत है | दिल टूटता ज़रूर है, मगर दूरदर्शिता इसी में है | इसीलिए कोविड को लेकर एक बार फिर देशव्यापी "जन-जागरूकता अभियान" ने ज़ोर पकड़ लिया है | जगह-जगह, हर जगह मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा दिख रहा है -

कोविड-19 से बचाव और सुरक्षित रहने के तीन उपाय :

1. मास्क लगाएँ |

2. दो गज़ दूरी, है ज़रूरी |

3. हाथ और मुँह साफ रखें |

दूरदर्शन का जाना-पहचाना चेहरा और यू-ट्यूबर नीतू शर्मा ने भी नक़्श के माध्यम से यही संदेश दिया है, ताकि त्योहारों की ख़ुशियाँ कहीं एक और लॉकडाउन की नज़्र न हो जाएँ | और कहीं फिर से किसी बाप-बेटी का रिश्ता लूडो खेलते-खेलते अदालत न पहुँच जाए | 

Thank you so much "Neetu Sharma ji" for your message regarding #Karo_na_karo_naa..

[Neetu Sharma is a senior TV anchor and YouTuber. http://www.youtube.com/c/ThoughtfulAffairs].


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Tuesday, June 16, 2020

#करो न (dos), करो ना (donts) - Chitra Mudgal

#करो न (dos), करो ना (donts) - Chitra Mudgal


#करो न (dos), करो ना (donts) - Chitra Mudgal

प्यासे कौए की कहानी से कौन इंसान अंजान होगा? जिसमें एक होशियार कौआ घड़े के पेंदे में पड़े हुए ज़रा से पानी को ऊपर लाने के लिए एक-एक कर उसमें तब तक कंकड़ डालता है, जब तक पानी इतना ऊपर नहीं आ जाता कि उसकी चोंच पानी तक पहुँच जाए और वह उसे पीकर अपनी प्यास बुझा ले| बाल-साहित्य का अभिन्न अंग बन चुकी यह कहानी आज दुनिया भर में मशहूर है और अनगिनत भाषाओं में पाई जाती है| लेकिन आज ज़माना है, सोशल मीडिया साहित्य का| कुछ अर्सा पहले सोशल मीडिया पर इसी प्यासे कौए की कहानी की एक अलग ही अभिव्यक्ति नज़रों से गुज़री| कहानी की शुरुआत बिल्कुल असल कहानी जैसी ही थी| पर उसका सार अलग और कुछ यूँ था|
प्यासे कौए ने घड़े में झाँका| पानी बहुत कम था| उसकी चोंच पानी तक नहीं पहुँच सकती थी| उसने आस-पास कुछ कंकड़ पड़े देखे| उसे तुरंत अपने परदादा के परदादा और उनके भी परदादा की विश्वप्रसिद्ध कहानी याद आ गई, जिसके लिए सदियों से उनकी तारीफ़ दुनिया के हर कोने में की जाती रही है| लेकिन 21वीं सदी के आधुनिक कौए ने अपने पूर्वज की समझदारी दोहराने के बजाए, अपनी ख़ुद की होशियारी से काम लेना ज़्यादा मुनासिब समझा| एक-एक कंकड़ छोटी सी चोंच से चुनते और उसे घड़े में डालते-डालते तो हालत और ख़राब हो जाएगी| एक तो प्यास, उस पर यह मशक़्क़त| न बाबा न| इसमें कहीं जान चली गई तो? और बस कौए ने फ़ौरन अपनी होशियारी का परिचय दिया| घड़े के सबसे निचले हिस्से पर चोंच से भरपूर वार किया| तुरंत वहाँ एक छेद हो गया और घड़े के अंदर भरा हुआ पानी बाहर छलक आया| कौए ने जी भर के पानी पिया| अपनी प्यास बुझाई और फुर्र से उड़ गया|
दोनों ही कहानियाँ शिक्षाप्रद हैं| अंतर बस इतना सा है कि पहली हमें यह सिखाती है कि विपत्ति के समय धैर्य और सूझबूझ से काम लेना चाहिए, घबराना नहीं चाहिए| जबकि दूसरी में भी विपत्ति के समय सूझबूझ से काम लेने और न घबराने की बात तो है; पर जो चीज़ ग़ायब है, वह है धैर्य; और उसकी जगह ले ली है अधीरता ने, स्वार्थ ने, शॉर्टकट ने| अधीरता, स्वार्थ और शॉर्टकट ही थे जिन्होंने घड़े को इस लायक़ नहीं छोड़ा कि उसके अंदर मौजूद थोड़े से पानी से कौए के बाद कोई और भी अपनी प्यास बुझा सके|
वैसे हम इंसान भी तो आज यही कर रहे हैं| कोविड-19 के इस कठिन दौर में यह अधीरता, स्वार्थ और शॉर्टकट कुछ ज़्यादा ही उजागर हो रहे हैं, जिन्हें देखकर असल साहित्यकार का दिल रो उठा है| चित्रा मुदगल वह वरिष्ठ लेखिका हैं, जिन्होंने अपने साहित्य द्वारा ऐसे-ऐसे मुद्दों को उठाया, जिन पर अक्सर लोग सोचते भी नहीं थे| कोविड-19 के बारे में भी नक़्श से बात करते हुए चित्रा जी भावुक हो गईं| हमारे अनुरोध पर कोविड मरीज़ों के प्रति समाज के रवैय्ये और ज़िम्मेदारी के विषय में उन्होंने अपना संदेश दिया|

Thank you so much "Chitra Mudgal ji" for your message regarding #Karo na, karo naa..

[Chitra Mudgal is a senior writer and winner of several prestigious awards. 
https://en.wikipedia.org/wiki/Chitra_Mudgal]

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Friday, June 12, 2020

#करो न (dos), करो ना (donts) - Black &/vs. White

#करो न (dos), करो ना (donts) - Black &/vs. White



#करो न (dos), करो ना (donts) - Black &/vs. White

*I can't breathe.. मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ.. George Floyd !!!! Derek Chauvin !!!! May 25, 2020 !!!! 
*Thousands gathered in Houston, Texas to bid a final farewell to George Floyd !!!!  June 9, 2020 !!!! 
तथाकथित सभ्य, आधुनिक, शिक्षित समाज के "सफ़ेद बनाम काले" श्रृंखला का एक और घिनौना व दिल दहला देने वाला अध्याय | Black vs. White. जिसने एक बार फिर सफ़ेद चमड़ी में दफ़्न कालिख पुते दिलों की क़लई खोल के रख दी| भारत अभी कोविड-19 के मद्देनज़र, ख़ुद को लॉकडाउन की मार से आज़ाद भी न करा पाया था कि अमेरिका में एक बेबस काले को कुछ गोरों ने बेदर्दी के साथ ज़िंदगी से ही आज़ाद कर दिया | 
क्या रंग वाक़ई इतना मायने रखता है ? 
सौभाग्यवश भारत में तो नहीं..
और दुर्भाग्यवश सिर्फ़ इंसानों में..
25 मई, 2020 को अमेरिका में जब सफ़ेद जिल्द के मालिक डेरेक शॉविन और उसके साथी पुलिसकर्मी, काली त्वचा वाले जॉर्ज फ़्लॉयड की सांसें छीन रहे थे; यहाँ भारत में कोविड-19 के कारण लागू लॉकडाउन अवधि के दौरान एक काला-सफ़ेद कबूतर का जोड़ा रोज़ मेरे कौतूहल को नए आयाम दे रहा था| शुरू-शुरू में तो मैंने बिल्कुल ग़ौर नहीं किया था | मगर जब एक बार ध्यान गया तो अनलॉक 2.0 में आ जाने तक भी हर रोज़ मेरी नज़रें कबूतर केे इस काले-सफ़ेद जोड़े का ही पीछा करती रहती हैं | किसी की छत हो या किसी की बाल्कनी, अटारी हो या पानी की टंकी, ज़मीन हो या खुला आसमान, हर जगह यह जोड़ा हमेशा, हर वक़्त साथ नज़र आता है | एक पल को भी एक-दूसरे का साथ छोड़ते अभी तक तो मैंने इन्हें नहीं देखा | हद तो यह है कि ज़मीन से उड़ान भी एक साथ भरते हैं और वापिस नीचे उतरते भी एक ही साथ हैं | यानी truely, made for each other. And genuinely, mad for each other. The real Black & White. 
शुरू में मुझे बड़ी हैरानी होती थी कि यह क्या माजरा है? एक कबूतर चाँदनी की तरह बेदाग़ उजला और दूसरा अमावस की तरह घटाटोप अंधेरे सा काला | कोई मेल है ही नहीं | फिर कैसे इन दोनों की यह अटूट जोड़ी बन गई ? वजह अब समझ में आई | शायद कबूतरों का यह black & white जोड़ा black vs. white के बारे में दुनिया को यह पैग़ाम देना चाहता है कि  रंग में नफ़रत नहीं, मौहब्बत खोजें| काला-सफ़ेद एक दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं | 
गोरी चमड़ी पर इतराने वाले भी, सिर के बाल काले ही पसंद करते हैं | सफ़ेद को अगर अमन के रंग की तरह देखा जाता है तो सफ़ेद कफ़न डर का अहसास भी देता है | उड़ते-फिरते सफ़ेद बादल आसमान में ख़ूबसूरत नज़ारा भले ही पेश करें, पर बारिश की पेशीनगोई काली घटा ही करती है | अस्पताल में डॉक्टर का एप्रन और नर्सों की सफ़ेद ड्रेस अगर सम्मान का प्रतीक है, तो इंसाफ़ के मंदिर में वकीलों और जजों के काले कोट व रोब्स अदालत के गौरव की कहानी कहते हैं | दुनिया के एक बड़े हिस्से में दुल्हन का सफ़ेद गाउन शादी की ख़ुशियों का परिचायक है, तो किसी की मौत पर भी सफ़ेद कपड़े ही पहनकर शोक दर्शाना आम परंपरा है | चर्च के पादरी का सफ़ेद लिबास मन में आदर पैदा करता है, तो शर्म-ओ-हया की निशानी काला बुर्क़ा औरत की इज़्ज़त करने को प्रेरित करता है | सफ़ेद संगमर्मर का ताजमहल सारी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करता है, तो काले हज्र-ए-असवद का बोसा लेने के लिए भी दुनिया-जहान के शायक़ीन अपना सब कुछ लुटाने को बेताब रहते हैं | गोरी राधा और काले कृष्ण की जोड़ी अनगिनत श्रद्धालुओं द्वारा पूजी जाती है; तो काले किसवाह में लिपटे मुक़द्दस काबा शरीफ़ का तवाफ़ करते, सफ़ेद एहराम ज़ेब-ए-तन किए हाजियों को देखकर दिल अक़ीदत से झुक जाता है | रात काली हो तो डराती है, मगर यही काली रात हमारे लिए नींद का सुख लेकर आती है | त्वचा का रंग कितना ही काला क्यों न हो, उसे सफ़ेद दिखाने के लिए कोई भी leukoderma या albinism पसंद नहीं करता है | काला जादू सर चढ़ कर बोलता है, तो भूत-प्रेत संकेतात्मक तौर पर सफ़ेद ही दिखाए जाते हैं | काले कोयले की खान में ही सफ़ेद चमचमाती रोशनी बिखेरता हीरा पाया जाता है | काले कौए और सफ़ेद हंस की चाल की मिसाल एक ही साथ दी जाती है | साहित्य, सफ़ेद काग़ज़ पर काले अक्षरों में ही छापा जाता है | अंतरिक्ष में जितने अहम white dwarf और black dwarf हैं, उतनी ही महत्ता milky way और black hole की है | बुराई बयान करने के लिए blacklist, blackmarket, blackmail जैसे शब्दों का ही प्रयोग नहीं किया जाता है; बल्कि सफेदपोश, सफ़ेद झूठ जैसे शब्द भी उतने ही प्रचलन में हैं | कुल मिलाकर सफ़ेद बिना काला अधूरा है और काले बग़ैर सफ़ेद नामुकम्मल| फिर भी black & white से ज़्यादा black vs. white संकीर्ण मानसिकता पर ऐसा हावी हुआ कि 1950 के दशक में the American civil rights movement was a struggle for the political equality of African Americans. It developed into the Black Power movement in the late 1960s and 1970s, and popularized the slogan "Black is Beautiful". पर इस आंदोलन के लगभग 70 साल बीत जाने के बावजूद white Americans आज भी black Africans को हेय दृष्टि से देख रहे हैं, उनका उत्पीड़न कर रहे हैं, उनकी हत्या कर रहे हैं और देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति का निवास स्थान भी चिल्ला-चिल्लाकर शायद यही कहने की कोशिश कर रहा है कि black & white नहीं, black vs. white ही स्वीकार्य है | तभी तो पूरे देश को चलाने वाला राष्ट्रपति black नहीं WHITE HOUSE में रहता है |
#करो न, करो ना.. के माध्यम से नक़्श की सिर्फ़ एक ही अपील है - 
सबका सम्मान करो न.. 
रंग, लिंग, जाति, धर्म, वर्ग, किसी भी आधार पर कोई भेदभाव करो ना.. 

(A special thanks to the innocent pair of black & white pigeons for unknowingly being the messenger of spreading message against racism, against black vs. white.)

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