Saturday, September 25, 2021

#करो_न_करो_ना - कोविड वैक्सीनेशन : डॉक्टर शहनाज़ अख़तर





#करो_न_करो_ना - कोविड वैक्सीनेशन : डॉक्टर शहनाज़ अख़तर, रिसर्च साइंटिस्ट 

               https://youtu.be/pF_r_G02TAY



Prevention is better than cure. यानी बचाव इलाज से बेहतर है | यह बात जानते तो सब हैं लेकिन कोविड के संदर्भ में इस पर अमल करने से अब भी भारत का एक बड़ा वर्ग हिचकिचाहट में है | सरकारी आंकड़ों के अनुसार 16 जनवरी 2021 से शुरू हुए कोविड टीकाकरण कार्यक्रम ने 13 सितम्बर 2021 को 75 करोड वैक्सीनेशन डोज़ का लक्ष्य पूरा कर लिया | यानी अब तक देश की आधी से ज़्यादा आबादी वैक्सीनेट हो चुकी है | मगर अपने आस-पास नज़र दौड़ाएँ तो पढ़े-लिखे, जागरुक और टैक्नीकली साउंड लोगों के अलावा सिर्फ़ उन्हीं के टीका लगा हुआ पाएँगे, जिन्हें ऐसी कोई मजबूरी है कि रोज़गार तभी मिलेगा, जब टीका लगवा लेंगे | या डॉक्टर तभी इलाज करेगा, जब वैक्सीनेटिड होंगे | या दूसरे शहर तभी जा सकेंगे, जब टीका लगा होने का सर्टिफ़िकेट हाथ में होगा आदि | वर्ना जहाँ तक हो सके यह वर्ग टीका लगवाने से अब भी कतरा रहा है | 

ये मासूम लोग शायद यह मानना ही नहीं चाहते कि कोविड महामारी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार अब तक सिर्फ़ वैक्सीनेशन ही है | या कोविड अक्सर बहुत तकलीफ़देह यहाँ तक कि कई बार जानलेवा बीमारी भी साबित होती है | कोविड से होने वाली तकलीफ़ सिर्फ़ वो ही समझ सकता है, जो इसकी चपेट में आ चुका है | न केवल कोविड के दौरान बल्कि बाद में भी कोरोना वायरस के long term effects और post-COVID complications ने अनगिनत लोगों को अपना शिकार बनाया है | जिसमें Severe Acute Respiratory Syndrome आमतौर पर पाया गया | इसके कारण lungs, brain, blood vessels, skin, nerves, kidney और heart संबंधी समस्याओं से कई-कई माह मरीज़ों को जूझना पड़ा | न सिर्फ़ जिस्मानी बल्कि दिमाग़ी तनाव से भी गुज़रना पड़ा | यह सब महज़ कही-सुनी कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि हमारे इर्द-गिर्द ही, हमारे पड़ोसी, रिश्तेदार, साथी, दोस्त और कई बार हमारे परिवार वाले ही इस बेदर्द वायरस का शिकार हो चुके हैं |

डॉक्टर शहनाज़ अख़तर भी, जो देश की एक टॉप फ़ार्मास्युटिकल कंपनी में रिसर्च साइंटिस्ट हैं, उन्हीं में से एक हैं, जो अंजाने और अनचाहे ही न सिर्फ़ कोविड की ज़द में आ कर ज़िंदगी और मौत के बीच की बाल से भी बारीक डगर को तय करके दोबारा जिंदगी के हसीन सफ़र पर लौट आईं, बल्कि post covid complications का सामना करते हुए कई माह तक सेहत और बीमारी के दर्मियान होने वाले ख़ौफ़नाक खेल की भुक्तभोगी भी साबित हुईं | अपनी आपबीती को बेहद कम अल्फ़ाज़ में हम तक पहुँचा कर हर ख़ास-ओ-आम से वैक्सीनेट होने की अपील करती डॉ. शहनाज़ अख़तर का दर्द उनकी ज़बान ही नहीं, बल्कि चेहरे और आँखों में भी दिखता है | जो सिर्फ़ यही कहता महसूस होता है कि मेहरबानी करके सब टीका लगवा लें | ख़ुद भी सुरक्षित हो जाएँ और एक निरोग सुरक्षित समाज के निर्माण में भी अपना योगदान दें |
#करो_न_करो_ना का नक़्श का यह दूसरा चरण है, जिसे हमने आज ख़ासतौर पर 25 सितम्बर से शुरू किया है क्योंकि आज डॉ. शहनाज़ अख़तर की सालगिरह भी है | जिंदगी सबसे क़ीमती है, यह संदेश देने का इससे बेहतर कोई मौक़ा नहीं हो सकता था | 

हमारे अभियान में अपना योगदान देने के लिए डॉ. शहनाज़ अख़तर, आपका बेहद शुक्रिया | साथ ही आपके जन्मदिन पर आपको A Very Happy Birthday और आपके साथ-साथ हर covid survivor के लिए एक लंबी, सेहतमंद ज़िंदगी की शुभकामनाएँ |

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Friday, November 6, 2020

#करो_न_करो_ना (dos & donts) - Parikul Bhardwaj

 #करो_न_करो_ना (dos & donts) - Parikul Bhardwaj


 #करो_न_करो_ना (dos & donts) - Parikul Bhardwaj

घर से निकलने को दरवाज़ा खोला ही था कि सामने से तीन साल के भतीजे ने अपनी टॉय पिस्टल तानते हुए बड़े स्टाइल में कहा - "हैंडसम"| मैंने हैंडसअप को हैंडसम पहली बार बनते देखा था| इसलिए भतीजे की मासूमियत पर मुझे बेसाख़्ता प्यार आ गया| मैंने पूछा - क्या चाहिए आपको? वो बोला - कितने दिन हो गए | कोई मुझे बाहर नहीं ले जाता| मुझे "वलीना आइसक्रीम" खानी है| इस बार मेरी हँसी छूट गई| बेचारी आइसक्रीम का फ़्लेवर ही बदल डाला| मैंने हँसते हुए वादा किया - आपकी वनीला.. सॉरी वलीना आइसक्रीम आपको शाम को घर पर ही मिल जाएगी, उसके लिए बाहर जाने की क्या ज़रूरत? बाहर बच्चों को डराने के लिए गंदे वाले कोविड अंकल बैठे हैं न, इसलिए बच्चे आजकल बाहर नहीं जा रहे हैं| मासूम बच्चा मेरी बात मान गया और मैंने अपनी राह ली|

बाहर निकलते ही एक रिक्शावाला दिखा| मैंने पूछा - कॉलोनी चलोगे? बोला - नहीं जी| वहाँ कुछ दिन पहले "लिमंट्री" लगी थी, वहाँ नहीं जाएँगे| मैंने अचरज से पूछा - लिमंट्री मतलब? बोला - बोर्ड लगा था न, कोई अंदर नहीं जा सकता| मैंने कहा - ओह! नो एंट्री| बोला - हाँ, हाँ, वो ही| मैंने कहा - पर वो तो लॉकडाउन की बात है, तब कॉलोनी कंटेनमेंट ज़ोन में थी| अब सब ठीक है| वह बोला - न, न| हम तब भी नहीं जाएँगे| आपके लिए इतना कर सकते हैं कि कॉलोनी से पहले जो "फ़ावरीगेट" पड़ता है, आपको वहाँ छोड़ देंगे| मैंने दिल्लीगेट से लेकर अजमेरीगेट, कश्मीरीगेट, लाहौरीगेट, तुर्कमानगेट, मोरीगेट यहाँ तक कि इंडियागेट तक सारे गेटों के नाम सुन रखे थे| पर फ़ावरीगेट आज पहली बार सुना| पूछ ही लिया - यह फ़ावरीगेट कौन सा है भैया? बोला - वही, जहाँ आग बुझाने वाली टमटमें खड़ी होती हैं| मुझे समझते देर न लगी, वह फ़ायर-स्टेशन में खड़े फ़ायरब्रिगेड को फ़ावरीगेट कह रहा था| मैंने उसे ग़लती का अहसास कराने के बजाए कहा - ठीक है भैया| आप मुझे फ़ावरीगेट पर ही छोड़ देना| उसके चेहरे पर एक चमक सी आई | रिक्शा पर पैडल मारता हुआ बोला - बैठिए| वैसे हमें लगता है आपने "अनवरसिटी" से पढ़ाई नहीं की है| तभी आपको न लिमंट्री पता है, न ही फ़ावरीगेट| अब मेरा दिमाग़ चकराया| मैंने पूछा - कौन सी सिटी? बोला - अनवरसिटी| जहाँ कालिज के बाद की पढ़ाई होती है| मेरा दिमाग़ भन्ना गया| मैंने ज़रा खीझते हुए कहा - अनवरसिटी नहीं, यूनिवर्सिटी | लापरवाही से बोला - एक ही बात है| वैसे आपने कहाँ तक पढ़ाई की है? न चाहते हुए भी मैंने बता दिया - बी. ए. तक| वह बोला - तभी तो कुछ नहीं पता आपको| दो ही अक्षर पढ़े, वो भी उल्टे| इतना तो हम भी बता सकते हैं कि पहले ए आता है, फिर बी| मैंने अपना सिर पीटते हुए कहा - बी. ए. मायने, बैचलर ऑफ़ आर्ट्स | पर तुम क्या समझो? यह कॉमन सेंस की बात है| वो अकड़कर बोला - ऐसा न कहें आप| हमारे पास है "कॉमन साइंस"| बहुत "कॉमन साइंस" है हमारे पास| उसकी बात सुन ग़ुस्से के बजाय इस बार मुझे हँसी आ गई| मैंने हँसते हुए कहा - ठीक कहा तुमने दोस्त| तुम्हारी कॉमन साइंस वाक़ई क़ाबिल-ए-तारीफ़ है| आज तुमसे मैंने बहुत कुछ सीखा| चलो अब मुझे यहीं उतार दो| देखो, तुम्हारा फ़ावरीगेट आ गया है| इसके आगे तो तुम जाओगे नहीं, क्योंकि कुछ दिन पहले वहाँ लिमंट्री जो लगी थी| वह विजयी मुस्कान के साथ बोला - देखा मेरी संगत का असर! आपको भी चीज़ें समझ में आने लगी हैं अब| किराया उसके हवाले कर मैंने उसे तो चलता किया, पर मन में ये ख़्याल चल रहे थे कि वाक़ई यह समझदार है, जो अनलॉक के दौर में भी इतनी सावधानी बरत रहा है| वर्ना आमतौर पर तो अब लोग न मास्क लगाए दिख रहे हैं, न सैनिटाइज़ेशन और दो गज़ की दूरी का ध्यान रखते|

ऐसे ही लोगों के लिए राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार 2020 से सम्मानित, देश की बहादुर बच्ची परीकुल भारद्वाज ने त्यौहारों के इस मौसम में, नक़्श के माध्यम से समाज को एक पैग़ाम दिया है| ताकि त्यौहारों की ख़ुशियों में कहीं हम यह न भूल जाएँ कि गंदे वाले कोविड अंकल अब भी घात लगाए बैठे हैं| ज़रा सी लापरवाही फिर से हमें लिमंट्री ज़ोन में ला खड़ा कर सकती है|

Thank you so much "Parikul Bhardwaj ji" for being a part of our campaign #karo_na_karo_naa..


[परीकुल भारद्वाज समाज में नेतृत्व, प्रेरणा तथा ऊंचे हिमालय शिखरों पर दी जाने वाली निस्वार्थ सेवाओं का एक जीवंत उदाहरण है। मात्र 13 साल की उम्र में वीरता, शौर्य का अद्भुत ज़ज्बा रखते हुए, उच्च पर्वत शिखरों पर जोखिम उठाने वाली, परीकुल भारद्वाज राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद द्वारा “राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार 2020” से सम्मानित हैं| इतनी ऊँचाइयों पर अपनी समाज सेवी गतिविधियों द्वारा समाज हित के लिए योगदान देने वाली, लोगों की जान बचाने के लिए कार्य करने वाली  सबसे कम आयु की पहली लड़की हैं। परिकुल किसी भी  वर्ग, पंथ, धर्म या जाति की परवाह किए बिना जोखिम भरे उच्च शिखरों पर स्वास्थ्य सेवाएं दे रही हैं। इस बचाव कार्य हेतु उनका कठिन प्रशिक्षण सिक्स सिग्मा हाई अल्टिट्यूड सेवाओं, आई.टी.बी.पी., एन.डी.आर.एफ. और वायुसेना के संयुक्त तत्वावधान में हुआ है। "नेशनल ज्योग्राफिक चैनल" और "आकाशवाणी" द्वारा भी उनके साहसिक, निस्वार्थ व अथक प्रयासों पर प्रकाश डाला गया है ।

परीकुल भारद्वाज द्वारा प्राप्त पुरस्कार / सम्मान:-

-थलसेनाध्यक्ष द्वारा सराहना

-इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड 

-विश्व के सर्वश्रेष्ठ 100 रिकॉर्ड धारकों  में से एक 

- सिक्स सिग्मा द्वारा प्रदत्त हाई अल्टि ट्यूड अवॉर्ड|

(Instagram @parikulbhardwaj) ]


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Saturday, October 10, 2020

#करो_न_करो_ना (dos & donts) - Neetu Sharma

 #करो_न_करो_ना (dos & donts) - Neetu Sharma


#करो_न_करो_ना (dos & donts) - Neetu Sharma

कोई 12-13 रोज़ पहले, 27 सितम्बर के "The Times of India" के Delhi edition में छपी ख़बर पढ़कर बेसाख़्ता हँसी आ गई | भोपाल की एक लड़की अपने पिता के ख़िलाफ़ फ़ैमिली कोर्ट जा पहुँची क्योंकि उसके पिता ने उसे कई बार लूडो खेलते हुए हरा दिया था |

दरअसल नोवल कोरोना वायरस कोविड-19 के कारण देशभर में लगे लॉकडाउन के दौरान, समय बिताने के लिए लड़की, उसके भाई-बहन और उनके पिता लूडो खेल लिया करते थे, जिसमें पिता ने बार-बार अपनी लाडली बेटी को हरा दिया | बेटी को यह पिता द्वारा जानबूझ कर किया गया विश्वासघात लगा क्योंकि उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसके पिता उसे कभी हरा सकते हैं | शुरू में बेटी को दुख हुआ | फिर दुख, ग़ुस्से में बदला | ग़ुस्सा, अपमान के अहसास में, उसके बाद नाराज़गी, फिर आक्रोश और आख़िरकार इन सारी भावनाओं ने द्वेष का वह विकराल रूप धारण कर लिया कि बेटी ने अपने पिता को पिता कहकर पुकारना तक बंद कर दिया और अदालत का दरवाज़ा खटखटा दिया |

पहली नज़र में यह ख़बर चौंका सकती है | हँसी भी आ सकती है | मगर ज़रा सा गहराई में सोचते ही मामले की गंभीरता समझ में आ जाती है | और तब एक ही बात सही साबित होती है कि पूरे वाक़ये में कोविड के अलावा और किसी का दोष नहीं | न कोविड इस बुरी तरह फैलता, न लॉकडाउन की नौबत आती, न पूरा परिवार एक साथ लूडो खेलने बैठता, और न यह सूरत-ए-हाल बनती कि बाप-बेटी के रिश्ते में दरार पड़ती | 

अगले हफ़्ते शारदीय नवरात्रि पर्व आरम्भ हो रहा है, और उसी के साथ-साथ क़तार में एक के पीछे एक चले आ रहे हैं - दुर्गा पूजा, महानवमी, दशहरा, शरद पूर्णिमा, करवाचौथ, अहोई अष्टमी और दीवाली | पर त्योहारों की इन ख़ुशियों के पीछे कोविड-19 अपना फन फैलाए डरा भी रहा है | बंगाल की दुर्गा पूजा, गुजरात का गरबा-डांडिया, करवाचौथ की कथा और मेहंदी का जमावड़ा या दशहरे की रामलीला, सभी भीड़-भड़क्का वाले त्योहार हैं | लेकिन कहीं भी भीड़ जमा न हो, इस साल प्रशासन की तरफ़ से सख़्त हिदायत है | दिल टूटता ज़रूर है, मगर दूरदर्शिता इसी में है | इसीलिए कोविड को लेकर एक बार फिर देशव्यापी "जन-जागरूकता अभियान" ने ज़ोर पकड़ लिया है | जगह-जगह, हर जगह मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा दिख रहा है -

कोविड-19 से बचाव और सुरक्षित रहने के तीन उपाय :

1. मास्क लगाएँ |

2. दो गज़ दूरी, है ज़रूरी |

3. हाथ और मुँह साफ रखें |

दूरदर्शन का जाना-पहचाना चेहरा और यू-ट्यूबर नीतू शर्मा ने भी नक़्श के माध्यम से यही संदेश दिया है, ताकि त्योहारों की ख़ुशियाँ कहीं एक और लॉकडाउन की नज़्र न हो जाएँ | और कहीं फिर से किसी बाप-बेटी का रिश्ता लूडो खेलते-खेलते अदालत न पहुँच जाए | 

Thank you so much "Neetu Sharma ji" for your message regarding #Karo_na_karo_naa..

[Neetu Sharma is a senior TV anchor and YouTuber. http://www.youtube.com/c/ThoughtfulAffairs].


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Tuesday, June 16, 2020

#करो न (dos), करो ना (donts) - Chitra Mudgal

#करो न (dos), करो ना (donts) - Chitra Mudgal


#करो न (dos), करो ना (donts) - Chitra Mudgal

प्यासे कौए की कहानी से कौन इंसान अंजान होगा? जिसमें एक होशियार कौआ घड़े के पेंदे में पड़े हुए ज़रा से पानी को ऊपर लाने के लिए एक-एक कर उसमें तब तक कंकड़ डालता है, जब तक पानी इतना ऊपर नहीं आ जाता कि उसकी चोंच पानी तक पहुँच जाए और वह उसे पीकर अपनी प्यास बुझा ले| बाल-साहित्य का अभिन्न अंग बन चुकी यह कहानी आज दुनिया भर में मशहूर है और अनगिनत भाषाओं में पाई जाती है| लेकिन आज ज़माना है, सोशल मीडिया साहित्य का| कुछ अर्सा पहले सोशल मीडिया पर इसी प्यासे कौए की कहानी की एक अलग ही अभिव्यक्ति नज़रों से गुज़री| कहानी की शुरुआत बिल्कुल असल कहानी जैसी ही थी| पर उसका सार अलग और कुछ यूँ था|
प्यासे कौए ने घड़े में झाँका| पानी बहुत कम था| उसकी चोंच पानी तक नहीं पहुँच सकती थी| उसने आस-पास कुछ कंकड़ पड़े देखे| उसे तुरंत अपने परदादा के परदादा और उनके भी परदादा की विश्वप्रसिद्ध कहानी याद आ गई, जिसके लिए सदियों से उनकी तारीफ़ दुनिया के हर कोने में की जाती रही है| लेकिन 21वीं सदी के आधुनिक कौए ने अपने पूर्वज की समझदारी दोहराने के बजाए, अपनी ख़ुद की होशियारी से काम लेना ज़्यादा मुनासिब समझा| एक-एक कंकड़ छोटी सी चोंच से चुनते और उसे घड़े में डालते-डालते तो हालत और ख़राब हो जाएगी| एक तो प्यास, उस पर यह मशक़्क़त| न बाबा न| इसमें कहीं जान चली गई तो? और बस कौए ने फ़ौरन अपनी होशियारी का परिचय दिया| घड़े के सबसे निचले हिस्से पर चोंच से भरपूर वार किया| तुरंत वहाँ एक छेद हो गया और घड़े के अंदर भरा हुआ पानी बाहर छलक आया| कौए ने जी भर के पानी पिया| अपनी प्यास बुझाई और फुर्र से उड़ गया|
दोनों ही कहानियाँ शिक्षाप्रद हैं| अंतर बस इतना सा है कि पहली हमें यह सिखाती है कि विपत्ति के समय धैर्य और सूझबूझ से काम लेना चाहिए, घबराना नहीं चाहिए| जबकि दूसरी में भी विपत्ति के समय सूझबूझ से काम लेने और न घबराने की बात तो है; पर जो चीज़ ग़ायब है, वह है धैर्य; और उसकी जगह ले ली है अधीरता ने, स्वार्थ ने, शॉर्टकट ने| अधीरता, स्वार्थ और शॉर्टकट ही थे जिन्होंने घड़े को इस लायक़ नहीं छोड़ा कि उसके अंदर मौजूद थोड़े से पानी से कौए के बाद कोई और भी अपनी प्यास बुझा सके|
वैसे हम इंसान भी तो आज यही कर रहे हैं| कोविड-19 के इस कठिन दौर में यह अधीरता, स्वार्थ और शॉर्टकट कुछ ज़्यादा ही उजागर हो रहे हैं, जिन्हें देखकर असल साहित्यकार का दिल रो उठा है| चित्रा मुदगल वह वरिष्ठ लेखिका हैं, जिन्होंने अपने साहित्य द्वारा ऐसे-ऐसे मुद्दों को उठाया, जिन पर अक्सर लोग सोचते भी नहीं थे| कोविड-19 के बारे में भी नक़्श से बात करते हुए चित्रा जी भावुक हो गईं| हमारे अनुरोध पर कोविड मरीज़ों के प्रति समाज के रवैय्ये और ज़िम्मेदारी के विषय में उन्होंने अपना संदेश दिया|

Thank you so much "Chitra Mudgal ji" for your message regarding #Karo na, karo naa..

[Chitra Mudgal is a senior writer and winner of several prestigious awards. 
https://en.wikipedia.org/wiki/Chitra_Mudgal]

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Friday, June 12, 2020

#करो न (dos), करो ना (donts) - Black &/vs. White

#करो न (dos), करो ना (donts) - Black &/vs. White



#करो न (dos), करो ना (donts) - Black &/vs. White

*I can't breathe.. मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ.. George Floyd !!!! Derek Chauvin !!!! May 25, 2020 !!!! 
*Thousands gathered in Houston, Texas to bid a final farewell to George Floyd !!!!  June 9, 2020 !!!! 
तथाकथित सभ्य, आधुनिक, शिक्षित समाज के "सफ़ेद बनाम काले" श्रृंखला का एक और घिनौना व दिल दहला देने वाला अध्याय | Black vs. White. जिसने एक बार फिर सफ़ेद चमड़ी में दफ़्न कालिख पुते दिलों की क़लई खोल के रख दी| भारत अभी कोविड-19 के मद्देनज़र, ख़ुद को लॉकडाउन की मार से आज़ाद भी न करा पाया था कि अमेरिका में एक बेबस काले को कुछ गोरों ने बेदर्दी के साथ ज़िंदगी से ही आज़ाद कर दिया | 
क्या रंग वाक़ई इतना मायने रखता है ? 
सौभाग्यवश भारत में तो नहीं..
और दुर्भाग्यवश सिर्फ़ इंसानों में..
25 मई, 2020 को अमेरिका में जब सफ़ेद जिल्द के मालिक डेरेक शॉविन और उसके साथी पुलिसकर्मी, काली त्वचा वाले जॉर्ज फ़्लॉयड की सांसें छीन रहे थे; यहाँ भारत में कोविड-19 के कारण लागू लॉकडाउन अवधि के दौरान एक काला-सफ़ेद कबूतर का जोड़ा रोज़ मेरे कौतूहल को नए आयाम दे रहा था| शुरू-शुरू में तो मैंने बिल्कुल ग़ौर नहीं किया था | मगर जब एक बार ध्यान गया तो अनलॉक 2.0 में आ जाने तक भी हर रोज़ मेरी नज़रें कबूतर केे इस काले-सफ़ेद जोड़े का ही पीछा करती रहती हैं | किसी की छत हो या किसी की बाल्कनी, अटारी हो या पानी की टंकी, ज़मीन हो या खुला आसमान, हर जगह यह जोड़ा हमेशा, हर वक़्त साथ नज़र आता है | एक पल को भी एक-दूसरे का साथ छोड़ते अभी तक तो मैंने इन्हें नहीं देखा | हद तो यह है कि ज़मीन से उड़ान भी एक साथ भरते हैं और वापिस नीचे उतरते भी एक ही साथ हैं | यानी truely, made for each other. And genuinely, mad for each other. The real Black & White. 
शुरू में मुझे बड़ी हैरानी होती थी कि यह क्या माजरा है? एक कबूतर चाँदनी की तरह बेदाग़ उजला और दूसरा अमावस की तरह घटाटोप अंधेरे सा काला | कोई मेल है ही नहीं | फिर कैसे इन दोनों की यह अटूट जोड़ी बन गई ? वजह अब समझ में आई | शायद कबूतरों का यह black & white जोड़ा black vs. white के बारे में दुनिया को यह पैग़ाम देना चाहता है कि  रंग में नफ़रत नहीं, मौहब्बत खोजें| काला-सफ़ेद एक दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं | 
गोरी चमड़ी पर इतराने वाले भी, सिर के बाल काले ही पसंद करते हैं | सफ़ेद को अगर अमन के रंग की तरह देखा जाता है तो सफ़ेद कफ़न डर का अहसास भी देता है | उड़ते-फिरते सफ़ेद बादल आसमान में ख़ूबसूरत नज़ारा भले ही पेश करें, पर बारिश की पेशीनगोई काली घटा ही करती है | अस्पताल में डॉक्टर का एप्रन और नर्सों की सफ़ेद ड्रेस अगर सम्मान का प्रतीक है, तो इंसाफ़ के मंदिर में वकीलों और जजों के काले कोट व रोब्स अदालत के गौरव की कहानी कहते हैं | दुनिया के एक बड़े हिस्से में दुल्हन का सफ़ेद गाउन शादी की ख़ुशियों का परिचायक है, तो किसी की मौत पर भी सफ़ेद कपड़े ही पहनकर शोक दर्शाना आम परंपरा है | चर्च के पादरी का सफ़ेद लिबास मन में आदर पैदा करता है, तो शर्म-ओ-हया की निशानी काला बुर्क़ा औरत की इज़्ज़त करने को प्रेरित करता है | सफ़ेद संगमर्मर का ताजमहल सारी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करता है, तो काले हज्र-ए-असवद का बोसा लेने के लिए भी दुनिया-जहान के शायक़ीन अपना सब कुछ लुटाने को बेताब रहते हैं | गोरी राधा और काले कृष्ण की जोड़ी अनगिनत श्रद्धालुओं द्वारा पूजी जाती है; तो काले किसवाह में लिपटे मुक़द्दस काबा शरीफ़ का तवाफ़ करते, सफ़ेद एहराम ज़ेब-ए-तन किए हाजियों को देखकर दिल अक़ीदत से झुक जाता है | रात काली हो तो डराती है, मगर यही काली रात हमारे लिए नींद का सुख लेकर आती है | त्वचा का रंग कितना ही काला क्यों न हो, उसे सफ़ेद दिखाने के लिए कोई भी leukoderma या albinism पसंद नहीं करता है | काला जादू सर चढ़ कर बोलता है, तो भूत-प्रेत संकेतात्मक तौर पर सफ़ेद ही दिखाए जाते हैं | काले कोयले की खान में ही सफ़ेद चमचमाती रोशनी बिखेरता हीरा पाया जाता है | काले कौए और सफ़ेद हंस की चाल की मिसाल एक ही साथ दी जाती है | साहित्य, सफ़ेद काग़ज़ पर काले अक्षरों में ही छापा जाता है | अंतरिक्ष में जितने अहम white dwarf और black dwarf हैं, उतनी ही महत्ता milky way और black hole की है | बुराई बयान करने के लिए blacklist, blackmarket, blackmail जैसे शब्दों का ही प्रयोग नहीं किया जाता है; बल्कि सफेदपोश, सफ़ेद झूठ जैसे शब्द भी उतने ही प्रचलन में हैं | कुल मिलाकर सफ़ेद बिना काला अधूरा है और काले बग़ैर सफ़ेद नामुकम्मल| फिर भी black & white से ज़्यादा black vs. white संकीर्ण मानसिकता पर ऐसा हावी हुआ कि 1950 के दशक में the American civil rights movement was a struggle for the political equality of African Americans. It developed into the Black Power movement in the late 1960s and 1970s, and popularized the slogan "Black is Beautiful". पर इस आंदोलन के लगभग 70 साल बीत जाने के बावजूद white Americans आज भी black Africans को हेय दृष्टि से देख रहे हैं, उनका उत्पीड़न कर रहे हैं, उनकी हत्या कर रहे हैं और देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति का निवास स्थान भी चिल्ला-चिल्लाकर शायद यही कहने की कोशिश कर रहा है कि black & white नहीं, black vs. white ही स्वीकार्य है | तभी तो पूरे देश को चलाने वाला राष्ट्रपति black नहीं WHITE HOUSE में रहता है |
#करो न, करो ना.. के माध्यम से नक़्श की सिर्फ़ एक ही अपील है - 
सबका सम्मान करो न.. 
रंग, लिंग, जाति, धर्म, वर्ग, किसी भी आधार पर कोई भेदभाव करो ना.. 

(A special thanks to the innocent pair of black & white pigeons for unknowingly being the messenger of spreading message against racism, against black vs. white.)

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Monday, May 25, 2020

#करो न (dos), करो ना (donts) - आवाज़-औ-अंंदाज़ की दुनिया |

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#करो न (dos), करो ना (donts) - आवाज़-औ-अंंदाज़ की दुनिया |

आज ईद-उल-फ़ित्र है | वह त्यौहार जिसका इंतज़ार दो दर्जात पर रहता है | एक, किसी भी और त्यौहार की तरह साल भर लंबा इंतज़ार | और दूसरा एक माह के रोज़ों की पुरख़ुलूस इबादतों के कामयाब इख़्तिताम के ईनाम के तौर पर मिलने वाला ईद का त्यौहार | एक शाम पहले चाँद दिखने के साथ ही गहमागहमी का जो आलम बच्चों से बुज़ुर्गों तक हर इंसान में होता है, उसे अल्फ़ाज़ की ज़िंदां में जकड़ पाना, सोच के पिंजरे में कै़द कर पाना, कुछ नहीं बस नामुमकिन है| लेकिन इस साल इस ना-मुमकिन का 'ना' रोज़ेदारों से नाराज़ हो कर कहीं जा कर छिप बैठा है और ईद के शैदाइयों के लिए तक़रीबन साढ़े चौदह सौ बरस में उस मुमकिन के हवाले कर गया है, जिसकी न तो किसी को तमन्ना थी, न ख़्वाहिश, न अरमान और न ही तसव्वुर | इंसानी तारीख़ की ऐसी पहली ईद, जिसमें आबिदों के लिए मसाजिद के दरवाज़े बंद पाए गए| न नमाज़-ए-जुमा, न तरावीह, न आख़िरी अशरे में मस्जिद में एअतकाफ़, न जुमातुल-विदा और न ही नमाज़-ए-ईद | हालांकि अल्लाह के बंदों ने इबादतों की अदायगी ज़रूर की, पर इज्तिमाई तौर पर मसाजिद या ईदगाह में नहीं, बल्कि अपने-अपने घरों में | 
मजबूरी रही | कोरोना वायरस कोविड-19 की वबा जो बिन बुलाए सिर पर आ पड़ी है | जिसने ईद के तालिब हर ख़ास-ओ-आम को मजबूर कर दिया है कि तीन बार एक-दूसरे के गले मिलकर ईद मुबारक कहने वाले, हाथ भी न मिलाएँ | इस दिन नए कपड़े पहनना मुस्तहिब है, जानते हुए भी नए कपड़े-जूते ख़रीदने बाहर न जाएँ | ईद की सेवइयाँ, ख़ुद ही पकाएँ और ख़ुद ही खाएँ | जिन्हें लगानी आती हो, वे घर में ही मेंहदी से अपनी हथेलियाँ सजाएँ, वर्ना कोरी हथेलियों को देखें और मन मसोस कर रह जाएँ | पुरानी चूड़ियाँ, गहने ही नए समझ कर पहनें और दिल बहलाएँ | ख़ुद ही सजें, घर को सजाएँ और ख़ुद ही यह सब देख कर ख़ुश हो जाएँ क्योंकि मेहमान तो कोई आ नहीं सकता और आप ख़ुद किसी से मिलने कहीं जा नहीं सकते | और सबसे बढ़कर आज कोई ख़ास बटुआ/पर्स/वॉलेट न उठाएँ, घरवालों के अलावा और किसी से तो ईदी मिलने से रही, तो इस साल इस ख़ुशी को भी भूल जाएँ |
आह! क्या दर्द है? क्या कर्ब है? जो नाक़ाबिल-ए-बयान है | क्या यही वह ईद है जिस पर आम इंसान के शायर नज़ीर अकबराबादी ने पूरी एक नज़्म इस ख़ूबसूरती से लिख डाली थी कि वह आने वाली नस्लों के लिए दस्तावेज़ बन गई ? कहते हैं - 
"हो जी में अपने ईद की फ़रहत से शाद-काम |
ख़ूबाँ से अपने-अपने लिए सबने दिल के काम ||
दिल खोल-खोल सब मिले आपस में ख़ास-ओ-आम |
आग़ोश-ए-ख़ल्क़ गुल बदनों से भरे तमाम ||"

या फिर यह वह ई़़द है,  जिस पर हर दौर के शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल का वह शेर याद आता है, जो उन्होंने ईद के लिए तो नहीं कहा था, पर जो 25 मई 2020 की ईद पर ऐन फ़िट बैठता है | फ़र्माते हैं - 
"ने तीर कमाँ में है न सय्याद कमीं में |
गोशे में क़फ़स के मुझे आराम बहुत है ||
होगा कोई ऐसा भी जो 'ग़ालिब' को न जाने |
शाइ'र तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है ||"

दर-हक़ीक़त मामला तो आजकल ये ही है कि हममें से हर एक अपने-अपने क़फ़स के अपने-अपने गोशे में दुबका बैठा है, इस डर से कि बाहर निकलने पर कहीं कोविड-19 न दबोच ले| मगर अल्लाह की बनाई इतनी बड़ी कायनात में ऐसे अक़ीदतमंदों की भी कोई कमी नहीं, जो न सिर्फ़ ख़ुद इस बात पर यक़ीन रखते हैं कि इंशाल्लाह जल्द ही सब ठीक होगा, बल्कि समाज की तरफ़ अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए पुरउम्मीद पैग़ाम भी देते हैं | 
आम इंसान की लाइफ़-लाइन बन कर तक़रीबन एक सदी से उनके हर सुख-दुख का साथी ऑल इंडिया रेडियो यानी आकाशवाणी के जाने-माने अनाउंसर, रेडियो जॉकी, न्यूज़ रीडर नक़्श की ख़ास दर्ख़्वास्त पर पूरे दिल से अपने दिल की बात लेकर नक़्श के सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर ईद की मुबारकबाद और कोविड-19 के ताल्लुक़ से अपने तास्सुरात हम सब तक पहुँचाने में भी पीछे नहीं रहे | साथ ही मशहूर फ़िल्म अदाकार रज़ा मुराद की अपील ने भी इन रेडियो जॉकीज़ की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाकर आवाज़ की दुनिया को एक अनोखा अंदाज़ बख़्शा और पैग़ाम को ख़ासतरीन रुत्बा अता फ़र्माया | 

Thank you so much "Awaz-o-Andaz" i.e. voices of radio for a message regarding #Karo na, karo naa..

*Message in the video is given by - [Shabnam Khan, Radio Jockey, AIR FM Gold; 
Farhat Naaz, Hindi News Reader cum Translator, News Services Division of All India Radio; 
Aamir Azeem, Radio Jockey, AIR FM Gold;
Shabnam Khanam, Announcer cum Compere, External Services Division  of All India Radio; & 
Raza Murad, legendary Bollywood Actor].

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Tuesday, May 19, 2020

#करो न (dos), करो ना (donts) - Children : our Present & Future

#करो न (dos), करो ना (donts) - Children : our Present & Future


#करो न (dos), करो ना (donts) - Children : our Present & Future


कोविड-19 की वजह से लागू लॉकडाउन ने बचपन लौटा दिया है क़सम से | कल शाम भी कुछ पुराने दोस्तों के साथ वीडियो-कॉन्फ़्रेंसिंग कर ख़ूब धमाचौकड़ी की | तय यह हुआ कि आज सब दोस्त अपने-अपने बचपन की एक नादानी बाक़ी सबको सुनाएँगे | एक दोस्त ने शुरुआत की -
मैं उन दिनों शायद 6-7 साल की रही होंगी | अपनी नानी के साथ कहीं जा रही थी | चलते-चलते नानी के पैरों पर मेरी नज़र पड़ी तो देखा उनकी चप्पल में रस्सी का एक लंबा सा टुकड़ा उलझ गया है जो नानी के साथ-साथ सड़क पर घिसटता हुआ आगे बढ़ रहा है | मैं अपनी नानी से बेहद प्यार करती थी | लिहाज़ा मुझे यह गवारा न हुआ कि रस्सी का वह गुस्ताख़ टुकड़ा मेरी नानी के पैरों का बंधन बने | कहीं यह नानी के पैरों में उलझ कर उन्हें गिरा न दे.. यह सोचते ही मेरा दिल धक से हो गया और नानी को गिरने से बचाने के लिए मैंने एक भी लम्हा और गँवाए बिना फ़ौरन रस्सी के उस दुष्ट टुकड़े पर अपना नन्हा पैर मज़बूती से रख दिया ताकि नानी के क़दम उस धूर्त की साज़िश से आज़ाद करा सकूँ | मगर यह क्या? इधर मेरा पैर उस टुकड़े पर पड़ा और उधर मेरी बुज़ुर्ग चहेती नानी मुँह के बल सड़क पर चारों ख़ाने चित्त | पास से गुज़र रहे राहगीरों ने लपक कर नानी को उठाया और पूछा कि कैसे गिर गईं ? नानी बेचारी कराहती हुई बोलीं - पता नहीं | पर मुझे तो पता था | नानी की तकलीफ़ देखकर मेरे आँसू निकल आए और मैंने रस्सी के टुकड़े की तरफ़ इशारा करके रोते-रोते ही चिल्लाकर कहा - यही है वह बदतमीज़, जिसने मेरी नानी को गिराया है | मुझे पता था यह ऐसा ही करेगा, इसीलिए मैंने इसको रोकने के लिए इस पर अपना पैर भी रखा | पर इसने फिर भी मेरी नानी को गिरा दिया | इतना कह, मैं दहाड़े मार कर रोने लगी | पर अचानक ही पास खड़ी भीड़ और दर्द से कराहती मेरी नानी सभी ठहाका मार कर हँस पड़े | उन सबकी हँसी की वजह उस दिन तो समझ में नहीं आई थी पर अब वह वजह बख़ूबी पता है | बस एक बात अब तक नहीं समझ पाई कि नानी को गिरने से बचाने की जुगत लगाने वाली, मैं उनसे ज़्यादा प्यार करती थी; या गिरकर चोट खाने के बावजूद मेरी नादानी को हँसी में उड़ा देने वाली नानी को मुझसे ज़्यादा प्यार था ?
दूसरे दोस्त ने बताया -
मेरी उम्र उन दिनों शायद 4-5 साल रही होगी और मेरी बहन की 6-7 साल | हमारा घर तीसरी मंज़िल पर था | हम दोनों के हाथ में, याद नहीं क्या चीज़ थी, जो हमें मम्मी को दिखानी थी | होड़ यह थी कि कौन पहले दिखाए? बहन बड़ी थीं | इसलिए वह मुझसे ज़यादा स्पीड में सीढ़ियाँ चढ़ कर मुझसे आगे निकली जा रही थीं, जबकि उनसे पहले मैं मम्मी के पास पहुँचना चाहता था | जब आख़िरी ज़ीने पर भी वह मुझसे आगे ही दिखीं तो अपनी नादान नन्ही अक़्ल का इस्तेमाल कर मैंने उनकी टाँग पकड़ कर उन्हें रोकना चाहा ताकि मैं उनसे आगे निकलकर मम्मी के पास पहले पहुँच सकूँ | मगर इधर मैंने टाँग पकड़ी और उधर कानों को चीरती हुई बहन की चीख़ मेरा दिल दहला गई | मैंने टाँग छोड़ बहन के चेहरे की तरफ़ देखा तो होश फ़ाख़ता हो गए | बहन का चेहरा ख़ून में लथपथ था और वह आसमान सिर पर उठाए बेतहाशा रो रही थीं | इतने में रोने की आवाज़ सुनकर मम्मी भी वहाँ पहुँच गईं | आनन-फ़ानन में बहन को डॉक्टर के पास ले जाया गया, जिन्होंने बताया कि मैंने जो उनकी टाँग पकड़ कर खींची उससे उनका मुँह इस ज़ोर से सीढ़ी से टकराया कि ऊपर वाला एक दाँत शहीद हो गया | वैसे तो उनके दूध के दाँत टूटकर पक्के दाँत निकलने का दौर चल रहा था और ऊपर की तरफ़ का एक दूध का दाँत पहले ही टूट कर पक्का दाँत निकलने के इंतज़ार में था | पर मेरी नादानी से बहन का जो दाँत टूटा वह दूध का नहीं, पक्का दाँत था | अब तो सारे घर पर फ़िक्र के बादल छा गए | लड़की को सारी ज़िंदगी पोपले मुँह के साथ जीना होगा | कितना अजीब लगेगा | चाँद सा चेहरा, पर बिना दाँत | और भी न जाने क्या-क्या? बहरहाल दाँतों के डॉक्टर ने ही तसल्ली दी कि इंतज़ार करो | यूँ तो तीसरी बार दाँत निकलता नहीं है | पर कौन जाने क़ुदरत कोई करिश्मा ही दिखा दे | और वाक़ई करिश्मा हुआ भी | पर वह नहीं जो आप सब समझ रहे हैं, बल्कि यह कि टूटने वाला एक दूध का और एक पक्का दाँत, जो कि एक दूसरे के पड़ोसी थे, उन दोनों की ख़ाली जगह को पुर करता हुआ बीचों-बीच एक अकेला दाँत कुछ इस तरह बहन के मुँह में उगा कि आकार में ज़रा सा चौड़ा था, पर इतना भी नहीं कि देखने में अखरे | और दोनों तरफ़ के पड़ोसी दाँतों से ज़रा-ज़रा सी दूरी पर था, पर वह दूरी भी इतनी नहीं कि देखने में बुरी लगे | यूँ कुल मिलाकर क़ुदरत ने बड़े ही संतुलन के साथ बहन के चेहरे की ख़ूबसूरती बिगड़ने से बचा ली | आज मेरी बहन भी दो बच्चों की माँ हैं और मैं भी अब दो बच्चों का बाप हो गया हूँ | मगर जब भी इस वाक़ये का ज़िक्र छिड़ता है मेरी बहन यह कहने से नहीं चूकती हैं कि सिर्फ़ मेरी वजह से वह कभी पूरे 32 दाँत की मालिक नहीं बन पाईं | लेकिन मैं आजकल यह सोचता हूँ कि कोविड-19 के इस युग में सिर्फ़ मेरी वजह से ही बहन ख़ुद ही नहीं, उनके दाँत भी सोशल डिस्टेंसिंग मेनटेन किए हुए हैं |
एक और दोस्त ने अपने बचपन का क़िस्सा साझा किया -
मैं क़रीब 6-7 या 8 साल की रही होंगी | घर के दरवाज़े के बाहर वाली दीवार में काफ़ी नीचे की तरफ़ एक गहरी दरार हो गई थी, जिसे भरने पर न हमारे घरवालों ने कोई ध्यान दिया और न ही पड़ोसियों ने | पर हम दोनों घरों के ही बच्चों के लिए वह दरार उत्सुकता और कौतूहल का विषय बन गई | हम सभी उस दरार के अंदर झाँक-झाँक कर मानो अपना खोया ख़ज़ाना ढूँढते रहते थे | एक दिन स्कूल से वापिस आकर घर में घुसती, उससे पहले ही एक बार फिर उस दरार ने मुझे अपनी तरफ़ आकर्षित किया | मैंने उसमें पूरी शिद्दत से झाँका और मैं हैरान रह गई | आज सचमुच उस दरार के अंदर दो ख़ूबसूरत, चमकते हुए मोती दिखाई दिए | मैंने वक़्त ज़ाया न करते हुए फ़ौरन अपनी पतली सी कमज़ोर उंगली दरार में डाल दी ताकि दोनों मोती हासिल कर सकूँ | पर मोती दूर थे और उंगली छोटी | इतने में ही घर का दरवाज़ा खुला और मैंने घबराकर उंगली बाहर निकाल ली | उस वक़्त तो मैं अंदर चली गई, पर उन दो मोतियों का मोह मुझे बार-बार उस दरार तक खींच कर लाता रहा | लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद हर बार ही मैं मोती हासिल करने में नाकाम होती | बताती किसी को नहीं थी कि कहीं मुझे अपने मोती किसी के साथ बाँटने न पड़ जाएँ | एक दिन फिर से सबकी आँख बचाकर मैं मोती-निकाल मिशन में जुटी हुई थी कि पीछे से मम्मी आ गईं | मुझे दरार में कभी उंगली तो कभी झाड़ू के तिनके से कुछ निकालने की कोशिश करते देख पूछ लिया कि मैं क्या कर रही हूँ | रंगे हाथों पकड़ी जाने पर झूठ न बोल सकी | बता दिया कि इस दरार में मेरे दो मोती हैं, वही निकाल रही हूँ | मम्मी हैरान हुईं कि इतनी बारीक सी दरार के अंदर मोती गए कैसे? बोलीं, हट तो ज़रा | मैं भी तो देखूँ | पहले तो काफ़ी देर उन्हें मेरे मोती दिखे नहीं | फिर मेरे बताए अनुसार आख़िरकार जब उनकी नज़र दोनों मोतियों पर पड़ी तो चिल्लाकर मुझे डाँटते हुए बोलीं - चल अंदर | ख़बरदार जो फिर कभी इस दरार के पास फटकी | मरने के काम कर रही है ? मोती नहीं, वे छिपकली के अंडे हैं | वह तो अच्छा है कि छिपकली ने काटा नहीं तेरे | वर्ना हमें तो पता भी न चलता कि क्या हुआ | फिर बिना देरी दरार को सीमेंट से भरकर बंद कर दिया गया | लेकिन कई साल मैंने इस ग़म में गुज़ार दिए कि मम्मी की वजह से मुझे अपने जादुई मोतियों से हाथ धोना पड़ा | जब तक विज्ञान की किताबों में ख़ुद नहीं पढ़ लिया कि छिपकली अंडे देती है और ये अंडे ख़ूबसूरत मोती जैसे दिखते हैं, तब तक मम्मी मेरी क़ुसूरवार ही रहीं |
एक और दोस्त बोला - 
मैं अपनी नहीं, अपने पापा के बचपन की शरारत बताता हूँ जो मैंने पापा से, दादा-दादी से और कई बड़ों से अनेक बार सुनी है और हर बार उसका बड़ा ही लुत्फ़ लिया है | मेरे पापा बचपन में बेहद शरारती थे | शरारतों का आलम यह था कि पूरा इलाक़ा उन्हें नाम से जानता था | जिधर से गुज़रते कोई शरारत ज़रूर करते | यह वाक़या शायद 50 के दशक का होगा | पापा तब 8-10 साल के रहे होंगे | वे पुरानी दिल्ली के बाड़ा हिन्दू राव में रहते थे | उन दिनों उस इलाक़े में भेड़-बकरियाँ बहुत घूमती थीं | एक दिन शरारत में एक भेड़ की पीठ पर चढ़ बैठे | पापा की तरह भेड़ का भी अपनी तरह का यह पहला अनुभव था | भेड़ एकदम घबरा गई और बौखलाहट में उसने जिधर जगह देखी, दौड़ लगा दी | अब घबराने की बारी पापा की थी | भले ही शरारती थे, पर थे तो बच्चे ही | कहीं भेड़ अपनी पीठ पर से गिरा न दे, इस डर से उन्होंने भेड़ के बालों को मज़बूती से अपनी मुट्ठियों में जकड़ लिया | अब भेड़ और ज़्यादा घबराई, और पहले से ज़्यादा तेज़ दौड़ने लगी | उसकी तेज़ दौड़ से डरकर पापा ने और जो़र से उसके बाल पकड़े | इससे भेड़ और तेज़ी से दौड़ी | और डर का यह सिलसिला पापा और भेड़ दोनों में स्पीड पकड़ता चला गया | इधर भेड़ और पापा की जान पर बनी थी और उधर सड़क पर मौजूद लोग तमाशबीन बन मज़े ले रहे थे | बिदकी हुई भेड़ की पीठ पर पापा की सहमी हुई सवारी ने बग़ीची अच्छा जी से ईश्लरी प्रसाद तक के कई राउंड लगाए | सड़क के दोनों किनारे खड़े लोग इस नायाब मंज़र को देख हँस-हँसकर लोटपोट होते रहे, पर किसी को यह ख़्याल न आया कि इस तमाशे को रोका जाए | आख़िरकार कुछ पापा ने हिम्मत दिखाई और कुछ भेड़ भी थक-थका गई, तब कहीं पापा और भेड़ का मैराथन पूरा हुआ | भेड़ का तो पता नहीं, उसके बाद क्या हुआ? पर पापा कभी नहीं बदले | कम उम्र में यह दुनिया छोड़ गए थे | मगर उनकी शरारतें कभी कम नहीं हुईं | उन जैसा शरारती न हममें से कोई है, न ही हमने कहीं और देखा | बचपन को उन्होंने आख़िरी साँस तक जिया और भरपूर जिया |
बाक़ी दोस्तों ने भी अपने-अपने बचपन की कारस्तानियाँ बयान कीं | किसी और पोस्ट में इसी प्लेटफ़ॉर्म पर वे यब भी ज़रूर आपसे साझा की जाएँगी | लेकिन इस पोस्ट को पढ़कर आपको भी अपने बचपन का कोई कारनामा याद आ गया हो तो नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखिएगा | फ़िलहाल तो मेरे ज़हन में यह चल रहा है कि अब से 10-20 बरस बाद अगर हमारी ही तरह दोस्तों के किसी ग्रुप ने इकट्ठा होकर अपने बचपन के क़िस्से दोहराए तो सारी दुनिया के दोस्तों के पास एक क़िस्सा कॉमन होगा | कोविड-19 की वजह से लॉकडाउन का क़िस्सा, जिसे आज दुनिया के हर कोने में हर बच्चा झेलने को मजबूर है | छिनते बचपन की इसी मजबूरी ने शायद इन मासूम बच्चों को इतना समझदार बना दिया है कि हालात की नज़ाकत को समझते हुए ये हम बड़ों से भी सावधानियाँ बरतने की अपील कर रहे हैं | अब यह हमारा फ़र्ज़ है कि इनकी अपील पर अमल करके इन्हें एक सुरक्षित दुनिया दें |
Thank you dear children for your message through #Karo na, karo naa.. Love you all. 

*Kids in the video - [Ahmad Jamil, Haniya Hasan, Amish Riaz, Ayesha Parvez, Krisha, Maryam Jamil, Aayat Ali, Arham Ali, Arka Rai, Arsh Parvez & Barirah Hasan].

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